एक समूची युवा पीढ़ी की साहित्य सेवी मुक्ता चकित विस्मित कर सकती है लेकिन सच तो यही है साहित्य में कम हुई दिलचस्पी और महान मानवीय मूल्यों से विरत होना ही कहीं इसका कारण तो नहीं है क्या साहित्य संस्कारों से मुक्त होने के कारण ही तो ऐसा नहीं हो रहा है आज का सबसे बड़ा और गंभीर प्रश्न है|
कविता कहानी गीत संगीत गीत संगीत के महान मानवीय सौंदर्य बोध तराने के आनंद से कैसे हो गया हमारा समाज इसकी व्याख्या विश्लेषण जरूरी है सबसे पहले हमें उन परिस्थितियों का ध्यान होना चाहिए जिसमें हमारी युवा पीढ़ी पली-बढ़ी है हम नहीं तो उन्हें कॉमिक से शुरू करके हैरी पॉटर की जादुई दुनिया दी है और फिर मास मॉल कल्चर और इंटरनेट के भीतर गूगल के हाथों सौंप दिया है हमने हार की जीत( सुदर्शन) ईदगाह ( प्रेमचंद) काबुलीवाला( रवींद्रनाथ टैगोर) के बरअक्स एक दूसरा बचपन दिया चमत्कार और जादुई दुनिया फिर बेहतर करियर के लिए तनावपूर्ण संसार में ढकेल दिया फालतू और उपयोगी की दीवार खड़ी की उपयोगिता को उपभोग बना डाला जीवन के महान मूल्यों यहां तक की मित्रता जैसे जरूरी रिश्ते को गैर उपयोगी बताकर कमरे में पूरी पीढ़ी को कैद कर दिया आश्चर्यजनक रूप से ठीक इसी समय हमारी कविताएं बेजान और बे स्वाद होती गई उनके भीतर से जीवन की युवा ऊष्मा गायब हो गई जैसे उनके भीतर का मान भी राख हो गया इस रूप से जहां युवा पीढ़ी महत्वपूर्ण और महान भावों से विरत हुई वहीं साहित्य सृजन की अपनी सीमाओं ने उसे साहित्य विमुख किया समूची युवा पीढ़ी की वस्तु गत परिस्थितियां एक तो साहित्य विमुक्ति वही उनको केंद्र में रखकर साहित्य सृजन नहीं हुआ आज की स्थिति ऐसी हो गई है कि अगर कोई चाहे भी तो उसे साहित्य कैसे मिलेगा सबसे लाभकारी पैसा और क्षेत्र होने के कारण बाजार से भी वह धीरे-धीरे गायब हो गया है पत्रिकाओं अखबारों चैनलों पर साहित्य का कोना भी अब नसीब नहीं है किताबों के आने चर्चित होने पर कोई खबर नहीं होती सिर्फ आयोजित लोकार्पण से आप लेखक और किताब का नाम जान सकते हैं इस व्रतियों के पाठ से कोई वातावरण नहीं बन सका हमें जीवंत मान्यता से भरपूर राग बालासाहित्य चाहिए जो युवकों को नई स्फूर्ति और संस्कार दे सके|
इस समस्या का एक बड़ा कारण वह भीड़ है जो अपने को कवि साहित्यकार मानकर रोज बहुत सारा आग्रह लिख रही है उसे प्रेम और पोर्न में फर्क करने की समय तक नहीं है साहित्य के नाम पर लिखी जा रही है रचनाएं एक अराजक माहौल रच रही हैं उसे हुए शब्दों का मलवा और अनंत दोहराव वाले ऐसे साहित्य ने एक अरुचिकार बनाया है जहां साहित्य को छोड़कर सब कुछ है यहां गंभीरता नहीं है एक तरह से गैर जिम्मेदाराना पन है यह आभासी माध्यमों में भी है और छपे हुए प्रश्नों के रूप में भी रोज ऐसा कुछ पढ़ने को मिलता रहता है जो सभी को साहित्य विमुख बनाता है स्वाद संस्कार बिगड़ जाने पर स्वादिष्ट व्यंजन की ना चाह रहती है ना ही जरूरत इस रूप में साहित्य की अभिरुचि ही कहीं खो सी गई है इस बीच कहीं अच्छी रचनाएं आती हैं तो वह भी अराजक माहौल में खुशी जाती हैं एक अजीब तरह के शोर का मंजर है जहां सभी बोलते हैं और कोई सुनता ही नहीं है पर इन विपरीत स्थितियों में भी थोड़े से लोग ही सही इस फालतू को लाभकारी क्षेत्र में सक्रिय हैं जो हमें निराश नहीं होने देते
कुछ कविताएं कुछ कहानियां कुछ उपन्यास कुछ ऐसा गद पद आही जाता है जो हमें और हमारे युवाओं को आकर्षित करता है इस रीज़न धर्म साहित्य से बाहर ज्ञान मीमांसा समाज विज्ञान और समकालीन गतिकी को समझने बूझने की रचनाएं कम ही सही आती है और हमारे ज्ञान बहुत को थोड़ा गहरा बनाती है पर कुछ हजार के बीच का यह विमर्श अत्यंत नाकाफी है अपने से बाहर लाखों युवाओं को जोड़ने में पूरी तरह विफल है हमें नए पाठक तैयार करने होंगे और लक्ष्य मानकर उन पाठक समूह को संबोधित करते हुए कुछ नया रचना होगा जिससे हमारी युवा पीढ़ी अनिवार्यता उससे जुड़े वरना हम सब एक साथ अपने युवा साथियों को महान अनुभूतियों मूल्यों से वंचित कर देंगे। निश्चय ही सचेतन और सक्रिय प्रयासों द्वारा ही साहित्य से युवा पीढ़ी को जोड़ सकते हैं। यह हमारा जरूरी कार्यभार है युवा पीढ़ी का साहित्य कला संस्कृति से विरत हो जाना विचार शून्यता का ऐसा आलम है कि बिना सोचे समझे वह ऐसे कार्यों को अंजाम दे देते हैं जिनका परिणाम दूरगामी और एक हद तक मानव विरोधी तक हो जाता है इस क्रम में साहित्य के लगाव का एक और अवसर बनता है वह हमारी शिक्षा प्रणाली पाठ्यक्रम। पाठ्यक्रम में मौजूद साहित्य कहीं ना कहीं हमारी युवाओं को साहित्य का साक्षात्कार कराने का माध्यम हो सकता था।