क्या भविष्य में हकीकत होगा हवा और मेथेन से बना भोजन?

सुनने में विज्ञान की गुप्त जैसा लग सकता है लेकिन यह सच है कि आने वाले कुछ वर्षों में हमारे खाने की मेज पर हवा और मिथेन से बने प्रोटीन यह ज्वालामुखी से निकले सूक्ष्म जीवों से युक्त आहार दिखाई देने लगे।


              उल्लेखनीय है कि एक कंपनी के बनाए बीफ और बर्गर के शाकाहारी विकल्पों को जैसी सफलता मिल रही है वह दिखाती है कि कृतिम प्रोटीन का बाजार काफी तेजी से बढ़ रहा है। अनुमान है कि अगले 10 साल के भीतर कृतिम मीट की बिक्री 10 गुना बढ़कर 140 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है जो वैश्विक मीट बिक्री का 10 फ़ीसदी होगा। खेती से पैदा होने वाले विशाल कार्बन उत्सर्जन से निपटने के लिए अब रोजाना के नुकसानदायक तत्वों को नई प्रौद्योगिकी और सदियों पुरानी की प्रक्रिया के सारे नए उत्पादों में तब्दील किया जा रहा है।


संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 2007 से 2016 के बीच हुए कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कृषि वानिकी और अन्य भू उपयोग गतिविधियों का 23 फ़ीसदी योगदान रहा है। इन में उत्पादन से पहले और बाद की प्रक्रियाओं को भी जोड़ लें तो यह योगदान 37 फ़ीसदी तक पहुंच जाता है। इसके अलावा मवेशी पालन के करीब 14.5 फ़ीसदी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन होता है। इसी से निपटने के लिए कुछ कंपनियां सामने आए हैं जिनमें एक है फिनलैंड के 16 फुट चोलिन नाम के एक खाद्य प्रोटीन पाउडर तैयार करने का काम कर रही है जिसमें पानी हवा और नवीनीकृत बिजली का इस्तेमाल किया जाएगा। यानी खाद उत्पादन के लिए कृषि कृषि की आवश्यकता ही नहीं पढ़ने वाली। 


                                 कंपनी के मुताबिक सोलिंग को बनाने के लिए माइक्रो को एक द्रव्य में डाला जाता है और उसे हाइड्रोजन व कार्बन डाइऑक्साइड के बुलबुलों से गुजारा जाता है। यह प्रक्रिया वाहिनी है शराब बनाने जैसी ही है बस इसमें अंगूर या अन्य का इस्तेमाल नहीं होता जैसे-जैसे द्रव्य गाढ़ा होता जाता है उसे सुखाकर एक महीन पाउडर बना दिया जाता है जिसमें करीब 65 फ़ीसदी प्रोटीन होता है खाने में गेहूं के आटे की तरह लगता है।


यह भी उल्लेखनीय है कि सितंबर में सोलर फूड्स ने नॉर्वे की कंपनी फेजर के साथ शोले नियुक्त उत्पाद पैदा करने के लिए एक समझौता किया जिनका इस्तेमाल मौजूद संयंत्र आधारित उत्पादों या भविष्य में प्रयोगशालाओं में निर्मित मीट बनाने में किया जा सकता है। कंपनी की योजना 2021 तक सोलंकी वाणिज्य की बिक्री की है। इसकी कीमत 5 यूरो प्रति किलो यानी करीब ₹400 प्रति किलो के आसपास होगी।


भारत में इसी तर्ज पर बेंगलुरु की एक कंपनी स्ट्रिंग बायो काम कर रही है पुलिस टॉप कंपनी मीथेन से प्रोटीन पाउडर बनाने में लगी है। यह पशुओं का चारा होगा। कंपनी का मानना है कि इस दुनिया में हम इंसान शायद सबसे असरदार काम यही कर सकते हैं कि वातावरण में जिस चीज की हमें जरूरत नहीं है उसे हम किसी जरूरत की तब्दील कर सकें


विशेषज्ञों का कहना है कि पर्यावरण को लेकर उसी चिंताएं और इंसानी स्वास्थ्य व पशुओं से जुड़े सरोकारों का असर है कि वैकल्पिक प्रोटीन की मांग और आपूर्ति दोनों में तेजी आ रही है। आज से 10 साल पहले खुदरा विक्रेता वैकल्पिक प्रोटीन की जोकिंग के तौर पर देखा करते थे लेकिन आज भी मानते हैं कि इन उत्पादों की मांग बहुत ज्यादा बढ़ रही है।


इसी तरह स्पेन की एक कंपनी 3D प्रिंटर से शाकाहारी टिक्का बनाती है जो खाने में देखने में मीट जैसा ही लगता है कुछ लोगों ने इसकी आलोचना की है कि इसमें पौधों के प्रोटीन होने के चलते सोडियम की मात्रा ज्यादा होती है हार्वर्ड के वैज्ञानिकों ने इस पर हाल ही में कुछ सवाल उठाए थे कि यह स्वस्थ आहार नहीं है। कुछ संगठनों ने इस नकली मीट के खिलाफ बाकायदा अभियान छेड़ रखा है। इसके उलट वैकल्पिक प्रोटीन के पैरों कारों की दलील है कि बर्गर में भी तो वसा और सोडियम ज्यादा होता है।


एक कंपनी का कहना है कि नए दौर के यह प्रोटीन कंप्रेशन सक्रिय होते हैं। कंपनी के प्रोटीन येलो स्टोन नेशनल पार्क के ज्वालामुखी से निकलने वाले गर्म झड़ने में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवों से बनाए जाते हैं। इस कंपनी ने 3.30 करोड डॉलर का निवेश जुटाया है अब इसकी योजना ज्वालामुखी वाले माइक्रोवेव से शिकागो में 35000 वर्ग फुट के क्षेत्र में काम करने पर बनाने के लिए डेढ़ हजार एकड़ की जमीन पर उगा चारा गाय चल जाती है।


कंपनी से जुड़े सूत्रों का मानना है कि अधिक कृतिम प्रोटीन स्वाद में बढ़िया हो उसका दाम ठीक-ठाक हो और बड़े पैमाने पर उसका उत्पादन किया जा सके तो भोक्ता तेजी से मांग करने लगेंगे।