आज तो अदालतें लगभग हर मामले पर निर्णय करती हैं चाहे किसी राज्य में सरकार का गठन हो भ्रष्टाचार का मामला हो या आस्था से जुड़े तीन तलाक क्या सबरीमाला मंदिर में प्रवेश का मामला। न्यायमूर्ति का न्यायपालिका के बीच में होना चाहिए 1950 के दशक में काम करना शुरू किया गया और तीन-चार दशकों में वह विश्व की सर्वाधिक ताकतवर अदालत के रूप में उभरा गया।
आज वह न केवल संसद और विधान मंडलों द्वारा बनाए गए कानूनों की समीक्षा करता है बल्कि सांसद और आधे से अधिक राज्यों की विशाल विधानसभाओं द्वारा निर्विरोध सारे संविधान संशोधन तक को उसने निरस्त किया है। बहरहाल इन पंक्तियों के लिखे जाने का शबरीमाले मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय का अनुपालन नहीं हो पाया है। अदालत ने निर्देश दिया था कि सभी उम्र की महिलाएं मंदिर में प्रवेश कर सकती हैं जबकि मंदिर में राजस्वाला नारियों को प्रवेश का अधिकार नहीं है इस तरह न्यायिक सक्रियता एक नाजुक मोड़ पर पहुंच चुकी है जब शीर्ष अदालत की बुद्धिमता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं ऐसे आदेश देती है जिन्हें लागू नहीं कराया जा सकता। याद आती है जिन्होंने अमेरिका को बहुत संख्या वाद के खतरे से आगाह किया था तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन को लिखे पत्र में उन्होंने आशंका जताई थी कि द्वारा निर्वाचित लोकतंत्र में कोई ऐसा शख्स जीत सकता है जनकल्याण के लिए कार्य ना करके किसी खास वर्ग के लिए कार्य करें और अल्पसंख्यकों को नुकसान पहुंचाए अदालत इसी बहु संख्यक वाद के खतरे से समाज को बचाती है। परंतु सबरीमाला मामले में प्रश्न बहुमत बनाम अल्पमत का नहीं है। इसमें सभी औरतों के प्रवेश पर मनाही नहीं है केवल राजस्वाला स्त्रियों पर रोक है। यह तीन तलाक से भी इस मायने में भिन्न है कि इसमें किसी औरत के साथ अत्याचार नहीं होता।
सवाल सैद्धांतिक है कि संविधान के अनुच्छेद 14 द्वारा प्रदत बराबरी के अधिकार के तहत उन्हें जाने की छूट मिलनी चाहिए क्या अनुच्छेद 25 एवं 26 के जरिए प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत इसे मंदिर प्रबंधन पर छोड़ दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ में एकमात्र महिला न्यायाधीश ने अलग राय दी कि धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न है संख्या का आतंक यदि शीर्ष अदालत के फैसले का उल्लंघन आस्था के नाम पर होगा तो हर संवेदनशील मामले में संख्या बल महत्वपूर्ण हो जाएगा कई ऐसे विवादित मुद्दे होते हैं जो संवेदनशील तो हैं किंतु उनमें न्यायिक निर्णय जरूरी होता है। संख्या बल के आधार पर तय होंगे तो अदालतें बेमानी हो जाएंगी लेकिन सबरीमाला प्रकरण के बाद शीर्ष अदालत को भी सोचना होगा कि जब मामला पूरी तरह का हो तो उसे न्यायिक आदेश से दुरुस्त किया जाए उसका समाधान जनजागृति की सामाजिक प्रक्रिया पर ही छोड़ दिया जाए अमेरिका संविधान के संस्थापक और पेपर के लेखकों को एक एलेग्जेंडर लिस्ट संख्या 78 में ' दी ज्यूडिशरी डिपार्टमेंट' नामक आलेख में टिप्पणी की है कि प्रस्तावित सरकार की न्यायपालिका शाखा राज्य की सभी 3 शाखाओं में सबसे कमजोर होगी क्योंकि इसके पास ना तो तलवार है ना धन। उसे चिंता थी कि न्यायिक निर्णय को शक्ति के साथ लागू कराने का कोई तंत्र नहीं था इसलिए इसके लागू होने पर संदेश था। उनकी चिंता स्वाभाविक और उचित थी। उसके पहले न्यायिक स्वायत्तता का कहीं कोई इतिहास नहीं था। ब्रूनो पर भी धर्म का मुकदमा चला। टॉप प्लेसमेंट अष्टम ने उनके विधर्मी होने की घोषणा की और धर्म न्यायाधिकरण ने उन्हें मृत्यु दंड दिया। कहा जाता है कि ब्रूनो ने जज को धमकी भरे अंदाज से ललकारा मेरे खिलाफ सजा सुनाते हुए तुम मुझसे ज्यादा भयभीत हो। अमेरिकी संविधान में न्यायिक समीक्षा का कोई प्रावधान नहीं है मगर वहां के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जॉन मार्शल ने मार्बरी बनाम मेडिसन 1803 मैंने पूर्ण व्याख्या के जरिए यह अधिकार प्राप्त कर लिया उन्होंने निर्णय दिया न्यायिक विभाग का निसंदेह क्षेत्राधिकार एवं कर्तव्य है कि वह बताएं कि कानून क्या है? यदि 2 कानूनों में आपस में विरोधाभास है तो अदालत निर्णय करेगी कि कौन कैसे लागू होगा इसलिए यदि एक कानून संविधान के विरुद्ध है और किसी मामले में वह कानून तथा संविधान दोनों लागू होते हैं तो अदालत को निर्णय करना होगा कि कानून माना जाए या संविधान। उन्होंने आगे लिखा कि संविधान किसी भी आम कानून से ऊपर है और संविधान को लागू करना न्यायाधीशों का कर्तव्य है। उन्होंने सवाल किया कि अगर ऐसा नहीं है तो फिर न्यायाधीशों को संविधान की रक्षा की शपथ दिलाई जाती है? इस प्रकार न्यायिक समीक्षा के अधिकार न्यायपालिका को एक अद्भुत शक्ति प्रदान की